कृष्ण की अर्जुन को कही ये 5 बातें जो जीवन की हर समस्या का हल कर सकती है।
नमस्कार दोस्तो हम आपका स्वागत करते है। मित्रो हिन्दू धर्म मे श्री कृष्ण का अवतार माना गया है। द्रापर युग मे देवकी ओर वसुदेव के घरमे सरी कृष्ण ने जन्म लिया था। भगवान सरी कृष्ण ने महाभारत का युद्ध हुआ तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को भागवत गीता का ज्ञान दिया था। गीता के माध्यम से श्री कृष्ण के साथ साथ पूर्ण जीवन मनुष्य को जीवाइन जीना का भी ज्ञान दिया करते थे। इस कलियुग मे भी मनुष्य इस भागवत गीता का ज्ञान अपने अंदर उतारे तो उसे जीवन मे कभीभी किसी मुसीबत या फिर किसी विपरीत परिस्थिति का उसको सामना नहीं करना पड़ेंगा।
ये 5 बातें आपका जीवन बदल सकती हैं ।
आज हम आपको बताने जा रहे श्री कृष्ण द्र्वारा बताई गई हुई इन पाँच बातों का वर्णन बताने जा रहे। तो आइए दोस्तो जानते है।
1. संकट से हम कैसे लड़े।
हम पृवों के आभास पर हम भविष्य की सुख दु:ख : की कल्पना करते है। हम भविष्य का ये दुख का कारण को दूर करने के लिए हम आज योजाना बनाते है। किन्तु हमे इन समस्या का हल आज करने से हमे बड़ाही लाभ मिलता है या फिर बहुत ही हानी पुहंसती है ये प्रश्न हम कभी भी बनही करते है। मित्रो सत्य तो ये है की आप संकट ओर उसका निवारण सात जन्मो लेते है। ये सात जन्मो व्यक्ति के लिए ओर सुष्टि के लिए भी होता है। आप अपने भूतकल स्मरण कीजिए। इतियास को देखकर आप तुरंत हि जान पाएंगे। जब जाब संकट आता है तब तब उसका निवारण करनी की शक्ति का जन्म होता है, यही तो जगत का चलन है। वस्तुह संकट ही जन्म शक्ति कारण होता है। जब प्रतेयक वक्ती जब संकट से निकलता है तो एकदम ही वह आगे बढ़ जाता है ओर अधिक चमकने लगता है ओर उसके अंदर बड़ाही आत्माविश्वास होता है ओर वह अपने लिए नहीं बल्कि पूरी दुनियामे वह अपना आत्मा विश्वास का दिखता है ओर अपने जीवनमे वह सफल ही बन जाता है। वास्तवमे होता है की जब संकट का जन्म होता है वो बड़ा ही अवसर वाली बात है। संकट का अर्थ होता है अपने आप को बदलना, संकट का सामना करना सीखे, आपका आत्माविश्वास बढ़ाने का । अपने विचारो को उचाई तक पोहंसना ओर अपनी आत्माशक्ति बहुत ही प्रबल बनाना होता है ये संकट। जो एक मनुष्य इन सभी नहीं करपता है तो वही उसके लिए बहुत ही संकट होता है।
2. सफलता का रहस्य ।
कभी कभी कोई घटना मनुष्य की जीवन किसरी योजना को तोड़ देता है जब मनुष्य उस घटना को अपने जीवन बहुत ही ओर एक प्रकार का केंद्र मान लेती है। पर क्या उनकी यह भविष्य मे मनुष्य की योजन के आधार पर वह निर्मित होते है क्या ? नहीं होते है। जिस प्रकार किसी उचे पर्वत पर सर्वप्रथम चढ़ाने वाला जब उस प्रवात की तलयों पर जो योजना बनाते है क्या वही योजना आपको उस प्रवत की चोटी पर आपको पुहंसाती है। नहीं, वास्तव मे जैसे जैसे वह ऊपर छड़ता है वैसे वैसे उसे कई सुनीतियों का ओर नई परिस्थिति का उसे सामना करना पड़ता है। प्रतेयक पथ वह अपने अगले पथ का निर्माण करता है ओर अपने अगले पथ का वह निर्णय लेता है। प्रतेयक पद उसकी योजना को बदलना पड़ता है। कई उसकी पुरानी योजनाओ को उसे खाई मे ना धकलदे। जब की वह उस पर्वत को अपने योग्य नहीं बनाता है। वो स्वयम ही उसे उस पर्वत की योग्य बनाता है। क्या जीवन के साथ वैसा ही होता है। जो मनुष्य की एक घटना अपना जीविन का वह एक केंद्र मान लेती है। जब की वहअपनी जीवन की गति को वही पर ही रोक देता है। जब की वह पाने जीवन मे वही सफल नहीं बन पाता है।
3. सही निर्णय कैसे ले।
जीवन का हर एक क्षण जीवन का एक निर्णय का क्षण होता है। प्रत्येक पथ पर आपको दूसरे पथ का आपको निर्णय लेना ही पड़ता है। जब वह निर्णय अपना प्रभाव छोड़ जाता है। आज के इस निर्णय के लिया होता है वही आप्क ओसुख ओर दुख का प्रतीक आपको देता है। ना वह निरनी अपने के लिए ओर नहीं आपने परिवार के लिए ओर नाही अपनी आने वाली पेढ़ियो का वह निर्णय होता है। जब कोई परिस्थिति आती जब हम बड़ा ही व्याकुल हो जाते है। जब वह निरनी का क्षण वह आपके लिए बड़ाही युद्ध बन जाता है। जब हम निर्णय करते है तब हम दुविधाता के लिए नहीं बलकी हम पने मन को शांत रखने के लिए वह लेते है। क्या कोई दौड़ते हुहे कोई भोजन करपाता है, नहीं करपाता है। क्या युद्ध के दरमियान वह कोई योग्य निर्णय कर पाता है, नहीं। वास्तवमे जब कोई शांत मन से कोई निर्णय करता है तब वह अपने के लिए वह बहुत ही सुखद भविष्य बनाता है। जब की कोई अपने मन को शांत करने के लिए कोई निर्णय करता है तब वह भविष्य अपने के लिए बहुत बड़ा पैड बनाता है यानि की वह सफल होता है।
4. आत्माविश्वास की ताकत होना जररी होता है।
जीवनमे आना वाला संघर्ष के लिए जब वह मनुष्य अपने के लिए नहीं मानता है। जब उन्हे अपनी बातों पर ही आत्माविश्वास नहीं होता है तब वह सब गुणो खो बैठ जाता है तब वह दुर्गुणों को अपनाता है। मनुष्य के जीवन मे दुष्टता तभी जन्म लेती है जब अपने आप पर उसको आत्माविश्वास नहीं होता है। आत्माविश्वास को ही वह अचाई को धारण करती है। यदि आपको मालूम नहीं है की आत्माविश्वास क्या है? मनुष्य जनता है उसका आत्माविश्वास ही उसको सफलता की ओर बढ़ाता है। जबकी उसे अपने आप पर ही आत्माविश्वास नहीं होता है तब उसके मनमे बड़ाही विपरीत परिस्थिति सामने आ जाती है। पर मनुष्य को अपने आप पर आत्माविश्वास होता है तो वही दुनिया की किसिभी परिस्थिति का सामना कर जाता है।
5. बच्चो की परवरिश कैसे करे।
पिता सदाय ही अपने बेटी की सदाय कामना करता है। जबकि उनके भविष्य की चिंता करते रहते है। इसी कारण वह आपने के लिए नहीं बल्कि पाने बेटे के भविष्य के लिए सदाय ही सुख ओर जीवनमे वह अच्छी सफलता पाकर वही अपनी पाकर बड़ाही आदमी बने एसी सब पिता की इच्छा एक पुत्र से होती है। जिस कारण पुत्र का पिता जब उन मार्गो मे पसार होता है जब वह पिता उयांके पुत्र वह मार्ग पर नहीं चलना चाहिए। जब की वह पुत्र अपने माता पिता के बारे ये तीन प्रश्न का उतर देना वही भूल ही जाता है। जिसमे पहला है , क्या समय के साथ वह प्रतेयक मार्ग बादल नहीं जाते है ? जिसमे दूसरा प्रश्न है, क्या प्रत्येक संतान अपने मातापिता की सबै होता है ? हा लेकिन संतानों को मातापिता उसको अच्छे संस्कार देते है। जिसमे तीसरा प्रश्न, क्या जीवनकी सभी जानकारी या सुनौतिया बहुत लाभकारी होती है ? इन सभी प्रश्नो का उतर उसके मातापिता को देना चाहिए। इसलिए एक पुत्र का ख्याल बहुत ही अच्छी तरह ओर सुखपूर्वक का उसको दिलाना चाहिए जैसा कारण वह अपने मातापिता की उम्मीद किसी भी तरह वह तोड़ न सके।
हम आपसे उम्मीद करते है की आपको इस वेदो पुराण की कथा आपको कैसी लगी उम्मीद करता हु की आप इस भगवान कृष्ण जो अर्जुन को ये पाँच प्रश्नो का जवाब अर्जुन ने अपने जीवन मे उतारे है वैसी आप अपने जीवनमे उतारे। नमस्कार दोस्तो।
