दयानु भक्त की आस्था और अकबर का इम्तेहान! | कलियुग की कथाएं भाग – ०५
मित्रो ये घोर कलियुग का समय हे। ईस विपरत कालमे हरिभजन का जरिया हे। जो भी मोक्ष को पाने के लिए जो हरि का नाम लेंगा हरी उसे बचाने के लिए इस कलियुग मे भगवान का रूप धारण करके हमे बचाने आते हे। इसी बातों लेकर हम आए हे कलियुग की कुस एसी कथा हे जिन्होने धर्मोमे हिन्दू की आस्था को ओरभी ज्यादा प्रबल किया था। तो चलिये दोस्तो हम आपको बताने जा रहे कलियुग की कथा। इस बार हम आपको बताने जा रहे की कैसे द्यानु भक्त की आस्था ओर अकबर का इम्तेहान कैसा हुआ इसके बारेमे आज हम आपको बताने जा रहे। हिमाचलमे कांगरा से 20 किलोमीटर दूर एक मंदिर स्थिर है। जिसका नाम ज्वालादेवी का मंदिर नाम है उसका दुसारा नाम है ज्योतावाली माँ मंदिर कहा जाता है। यहा पर पृथ्वी के गर्भ से 9 अलग अलग ज्वाला निकलती है। जिसके ऊपर ही ये मंदिर बनाया गया हुआ है। इन 9 ज्योतियों के नाम है जिसमे पहला है महाकली, अन्नपृणा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महाल्क्ष्मी, सरस्वती, अंबिका ओर अनजानी देवी के नाम से जाना जाते है। इज जघ के बारेमे एक कथा अकबर ओर माता के परम भक्त दयानु भगत से जुड़ी हुई कथा है। जिस दिन भारतमे अकबर का शाशन था। उनही डीनो की ये घटना है।
हिमाचल के नादोन गाँव के निवासी माता एक सेवक ध्यानु भक्त 1000 यात्रीयो के सहित माता के दर्शन करने जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के चिपायोने ने चाँदनी चौक दिल्ली मे उन्हे रोक दिया था। ओर अकबर के दरबार ले जाकर दयानु भक्त को पेश किया। तब बादशाह ने पूछा तुम इतने सारे आदमियोको लेकर कहा जा रहे हो ? तब ध्यानु ने महाराज बादशाह को जवाब दिया की मे इन सभीको ज्वालादेवी के दर्शन करने लेकर ज्जा रहा हु। मेरे साथ जो लोग है वोभी माता के भक्त है ओर हम लोक यात्रा पर जा रहे। अकबरने ये सुनकर कहा ये ज्वालादेवी कौन है ? ओर व्हा जाने से हमे क्या होंगा ? तब दयानु भक्तने उत्तर दिया ओर कहा महाराज ज्वालादेवी इस संसार का पालन करने वाली दैवी है। वो भक्तो के सच्चे दिल से प्राथना का माँ ज्वालादेवी स्वीकार करती है। उनका प्रताप एसा है की उनके स्थान पर बिना कोई तेल बत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम सभी लोग प्रतिवर्ष हम उसके दर्शन करने जाते है। अकबर ने कहा ये तुम्हारी भक्ति सच्ची हे तो दैवी माता जरूर तुम्हारी इज्जत रखेंगी अगर वो तुम जैसा भक्तो ख्याल नहीं रखटी है तो फिर तुम्हारी इस इबादित पर क्या फायदा होंगा। या तो वो दैवी यकीन के काबिल नहीं है या तो फिर ये तुम्हारी इबादत जूठी है। इम्तहान के लिए हम यूंहारे घोड़े की गार्डन को हम सर से अलग कर देंगे। यदि तुम उसे जिंदा देखना चाहते है तो तुम अपनी दैवी को कहकर तुम घोड़े को जिंदा रख देना। ओर ईसा प्रकार घोड़े की गरदन काट दिया था। ध्यानु भक्त न कोई उपाय देखकर बादशाह से एक माह की एक आवती तक घोड़े के सिर वर्धक को रक्षित करनी की प्राथना की थी। ओर अकबर ने दयानु भक्त की बात मान ली थी। ओर उसे यात्रा करने की परवानगी देदी गई थी।
बादशाह से विदाय लेकर भक्त दयानु भगत ओर पूरे भक्तो के माता के मंदिर उपस्थित हुई। स्नान पुंजन आदि करने के बाद ओर रातभर उसने जागरण किया था। सूर्य निकलते ही समय आरती के समय हाथ जोड़कर दयानु भक्तने प्रथना की थी की ” है माता आप तो अंतरयामि है बादशाह मेरी भक्ति की परीक्षा ले रहे है ओर मेरी लाज रखना। देवी ये मेरी प्रथन है की मेरे को घोड़े को आप जीवित कर देना ” ये बात कहकर है देवीने उसकी बात सुन ली थी ओर अपने भक्त की लाज रखते हुई माने उस घोड़े को जिंदा कर दिया था। ये सबकुस देखकर महाराज बादशाह अकबर बहुत ही हैरान हो गए थे। उस अकबर ने अपनी सेना बुलाई ओर खुद अकबर अपनी सेना को लेकर मंदिर की तरफ चलें लंगा। वाहा अकबर पोहसकर फिर उसके मनामे एक शंका हुही उसने अपनी सेना के सहारे माँ की ज्योति बुजने के लिए उसएन एक अकबर नहेर बनवाया था। लेकिन माँ की कृपा से वह से ज्योतिया नहीं बुज पाई। इसके बार अकबर माँ के चरनोमे पौहसा। लेकिन उसे आहकर था की उसने सभामंड यानि की 50 किलो सोने की छत्र हिन्दू मंदिर मे चड़ाया है। इसलिए माता ज्वालादेवी उस छत्र को काबुल नहीं किया बल्कि छत्र को लोहे का बनाया गया ओर उसे खंडित कर दिया था। यदि आप उसे देखना चाहते हो तो आजा भी वाहा ज्वालादेवी के मंदिर पर आप उस अकबर के दिये गए हुहे छत्र को आप वर्तमान मे आप देख सकते है। जब माँ ने अकबर का घमंड एकदम सुमंतर कर दिया था तब अकबर ने वहा पर माँ के भक्तो के लिए वह पर सराया बनवाया था। गर घोड़े का सर नहीं जुड़ा होता तो अकबर जैसा शहेंशाह दिल्ही से हिमाचल प्रदेश क्यू जाता है।
तो दोस्तो ये थी माँ के अनन्य दयानु ध्यानु ओर अकबर की कहानी। आपको ये आज की ये कथा आपको कैसी लगी थी।
