भगवान कृष्ण के मुस्लिम भक्त हरिदास खान की कथा | कलियुग की कथाएं भाग – ०४
मित्रो ये घोर कलियुग का समय हे। ईस विपरत कालमे हरिभजन का जरिया हे। जो भी मोक्ष को पाने के लिए जो हरि का नाम लेंगा हरी उसे बचाने के लिए इस कलियुग मे भगवान का रूप धारण करके हमे बचाने आते हे। इसी बातों लेकर हम आए हे कलियुग की कुस एसी कथा हे जिन्होने धर्मोमे हिन्दू की आस्था को ओरभी ज्यादा प्रबल किया था। तो चलिये दोस्तो हम आपको बताने जा रहे कलियुग की कथा। इस बार हम एसी महान भक्ति कृष्ण भगवान की कथा आपको बताने जा रहे जो डीएचआरएम से वो मुस्लिम थे परंतु उनमने एक एसी भक्ति जो सरी कृष्ण को आना पड़ा। तो चलिये मित्रो अब हम कथा शरू करे।
मुस्लिम भक्त हरिदास खान की कथा |
वर्तमान के एक बांग्लादेश के यशोहर जिल्ले मे झ पर एक छोटा सा गाँव एक बुढ़न था। एसी गाँव मे एक गरीब मुस्लिम परिवार रहता था। इसी परिवार मे एक हरिदास खान का जन्म हुआ था। पूर्व जन्म के संस्कारी थे। उसमे बाल्यकाल से ही उसमे हरिदास की श्रद्धा ओर हरी के नाम जपने थी। जैसे ही किशोर होते हे तभी से उन्हे वैराग्य ले लिया था ओर गृहत्याग कर दिया था। जब वनग्राम समीप उसमे जंगल के अंदर एक कुटी बनाकर रहने लगे। हरिदास खान बड़े ही शांति प्रिय ओर धेर्यवान साधू थे। क्षमा उनका गुण था ओर निर्भयता उनका आभूषण था। उनकी आवाज मे बड़ा ही माधुर्य था। वो लगभग प्रतिदिन तीन लाख पर वे हरी के नाम जपते थे। वो जाप ही एक ऊसी आवाज मे करते थे। किसीने उनको ज़ोर ज़ोर से जप करने का कारण पूछा। ? महाराज क्या भगवान को कम सुनाई देता हे जो आप इतने उच्च स्वर मे आप जाप करते हे या फिर आपका अन्य कारण है। तब हरिदास खान ने उनको उतार दिया की… भक्त ये हरी का नाम बड़ा ही अलौकिक है। इसका श्रवण मात्रा ही प्राणी को इस नर्क से मुक्त करा देता है। मे इसी कारण मे जाप उच्च स्वर मे करता हु। इस वनमे जीतने भी जीवजंतु हे वातावरण मे कितने प्रकार के अद्रश्य किट्टपतंगे ये सब इंनका श्रवण करे ओर भव से पार हो जाये। हरिदासजी बोले उनकी बात से वो व्यक्ति संतुष्ट हो गया। तब उनकी छाती बढ़ती जा रही तब कितने ही लोग अपना आदर्श मानकर उनके भागवत भक्त हो गए ओर उनकी छाती कुस लोग जलते भी थे ओर छेड़ते भी थे।
इस गाँव मे एक रामचंद्र खान का एक जमींनदार था। उसने उसकी साधना ओर करती को नष्ट करेनेका एक षडयंत्र को रचा ओर उसने एक वेश्या को धन का लालस दिया। वेश्या धन की दीवानी थी ही उसने तत्काल सहमति देदी। रूप ओर सोंद्रय की साक्षात मूर्ति उस वेश्या ने शणगार कीया था। तब वो वेश्या रात्री के समय हरिदास की कुतिया मे पुहस गयी थी। लेकिन हरिदास खान भगवान की आराधनामे लिंग थे। उनका मनोहर रूप देखकर वेश्या उनपर फिदा हो गई ओर एक तो उसका उदेश्य भी वैसा भी था। दूसरे हरिदासजी की तेजस्वी मुखमुद्रा से देखकर उसके मन के अंदर काम का विकार आ गया। वो नीलस होकर वो निवस्त्र हो गयी ओर रात भर उनपर कुस श्रेष्टा करने का प्रयास करती रही। रात्रीभर वो वेश्या हरीदास की समाधि को भंग करने मे प्रयास करती रही परंतु वेश्या सफल न हुई। सूर्योदय होने से पहले उन्हे अपने वस्त्र पहने लिए ओर चलने की तैयारी कर रही तब हरिदास उसे रोकते हे ओर कहते हे की… देवी ! क्षमा चाहता हु । समाधिरहस्थ होने के कारण मई आपसे बाते कर नहीं सका। आप किस प्रकार यहा पर आई थी, तब वो वेश्या मुस्कराते चली गई। वो वेश्या दिनरात अपने प्रयास मे विफल रही थी। तब वो साधू अपनी समाधि से नहीं हटा था। जब की उस वेश्या के कानो मे निरंतर हरी नाम की आवाज गूंजने से उसका अंतकरण शुध्ध हो गया था। वो वेश्या चौथी रात्री भी आई थी तबभी हरिदास जी अपने पूर्णभाव से भजनमे लिंग थे की इनके आखो से आँसू की धारा बह रही थी। तभी वेश्या को आत्माज्ञानी हो गयी थी।
तब वेश्या को आभास हो गया की ये कोई असाधारन साधू नहि हे वो सोचने लगी जो मौज जैसी परमसुंदरी का उपस्थित होकर आभास भी नहीं करता हे वो अपनी धुन मे लिन रहता हे तो निशिष्य ही इसे अलौलिक आनंद की प्राप्ति हो रही है। अवश्य ही इसे कोई अन्य एसा आनंद प्राप्त हे जिसके समक्ष वो संसार के सभी रूप इसक सामने फीके लगते हे। वेश्या उनको पर्त्भष्ट करने आई थी तब उनके सामने स्वयं ही सतमार्ग मे निकाल पड़ी थी। उसे हरिदासजी ने दक्षित होकर एक तपस्वनी बना दिया था। उन्होंने उसके स्थान को उन्होने को सोपा था। ओर स्वयं ही हरीनाम प्रसार करने चले गए। तब वेश्या ऊसी कुटीमे हरी के नाम जप करने लगी थी। ये साधू संत ओर हरीनाम श्रवण का प्रताप था की वो वेश्या भी आगे जाकर एक भगवान के लिए परमभक्त बने। हरिदास वहा से निकालकर शांतिपुर पुहंसे। शांतिपुर मे मुसलिम शाशक था। उस ध्रमाद शहसक के कार्न हिन्दू को अपनी धर्म चलना बहुत ही कठिन हो रहा था। एसेमे हरिदास एक मुस्लिम होकर भी एक हिन्दू का एक आचरण करते हुहे हरीराम लेते थे। उनमसे कुस मुस्लिम को ये बात बहुत बुरी लगी थी ओर ये बात वाहा के बादशाहा को बताई। टीबी बादशाह ने कहा की जाओ सैनिकों हरिदास को गिरफ्तार लेकार लाओ। तब उन्हे पकड़कर हरिदासको जैल मे दाल दिया था। तुरंत ही ये खबर आग की तरह हरिदास के भक्त मे पड़ने लगी। सब लोग बड़े ही दुखी हुई ओर अन्याय बादशाह की सर्वत्रभस्म होने लगी थी। इधर हरिदास जैल मे भी हरिराम का जाप करने लगे थे ओर जैल मे अन्य बंदी होने वाले सभी लोग उनके भक्त हो गए थेजब ये स्थिति को काबू से बाहर देखते हुहे अदालत मे उसका मूरतमा चलाया था। तब उन्हे अदालत मे काजी के सामने लाया गया था। तब वाह के जज ने कहा की हरिदास तुम भागी से एक मुस्लिम घरमे पैदा हुहे हो तो तुम फिरभी काफिलो के देवताओ के नाम जपते रहते हो ओर उनहा तुम आसरण करते हो। हम तो हिन्दू के घर का हम पानीभी नहीं पीते हे। ये महापाप तुम न करो। इसके लिए तुम्हें जनमूलकी आग मे जलूसना होंगा। अब तुम कलमा पधलों तो तुम पाक हो जाएँगे। तब हरिदास ने कहा की….
” हे काजी साहब! संसार का मालिक एक है। उसकी दर्ष्टि मे मानव की अलग अलग कॉम नहीं है। हमने ही उसको बाँट रखा है। ऊसी हरी ने प्रतेयक मानव को ये अधिकार दिया है की जो वो मानव चाहे जिस नाम की वो मानव आराधना कर सकता है। जब उसे अल्हाह, भगवान आप जोभी नाम दे उसकी दर्ष्टि मे अपराधी नहीं हु तो आपके अनुसार मे कैसे अपराधी हुआ।” तब काजी साब बोले ये अपराध हे तुम्हें सख्त सजा मिलनी चाहिए। ” ये काफिर हे। उसे इसके गुनाह के लिए उसे बाईस बजारोमे घुमाया जाये ओर इसे इतने ब्रेट लगाया जाये की इसकी साँसे उसका स्वास छोड़दे ” क्रोध मे लेकार ये सजा हरिदास को सुनाई गयी। तब हुक्म की तालिम हुई हरिदास को घूमते हुहे बजारोमे ब्रेट लगाना जाए। हरी के नाम पर पने प्राणो को मे लिंग कर लिया था। तब ब्रेटोके मार से उसके मुहासे एक शब्द तो क्या हु हु भी आवाजभी नहीं निकलि थी तब मारने वाले थक गए परंतु पीटने वाला अडिग रहा। क्यूकी हरिदास ने अपने प्राणो को स्थिर करकर रख दिया था। इसलिए सिपाहियो ने उसको मरा हुआ मानकर उसको नदी मे फैक दिया था। परंतु जिसकी जीवन की डोरी स्वयं जग्गन्नाथने पकड़ी है उसे कौन मार सकता है। वो चेतन होकर जीवित होकर वो गंगा से बाहर आए। जब अधिकारियों ये सुना की तो वो लोग भी भयभीत होकर तब हरिदास के जाकर पुहसे तब उसके चरण पकड़ लिए थे। तब हरिदास संत ने उन सभी को माफ कर दिया था ओर हरीनाम का जप जप करते करते वह से चले गए।
