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गया में पिंडदान क्यों करते हैं? ओर गया का राज किस तरह छुपा है !

गया में पिंडदान क्यों करते हैं? ओर गया का राज किस तरह छुपा है !


दोस्तो हम आपका स्वागत करते है। जानिए दोस्तो अप सभीने अस्थिर गया तीर्थ के बारे आपने सुना ही होंगा। जिसे हिन्दू धर्म मे उसको मोक्षस्थलीभी कहा जाता है। इसका कार्न हे की यह हर वर्ष देश दुनिया के अलग अलग अलग भागो से लाखो हिन्दू गया मे आकार अपने परिवार की मृत व्यकती की आत्माकी शांति ओर मोक्ष की कामनाए से वो श्राद्ध, दर्पण ओर पिंडदान करते है। ऐसा माना जाता है की गया पिंडदान करने से 108 कुल ओर 7 पेढ़ियो का उधार हो जाता है। गरुड पुराण मे गया को विश्वमे पिटरों की मुक्ति के लिए विश्व का श्रेष्ट स्थाल माना जाता है। वैसे तो पूरा साल गयाजी मे तो पिंडदान किया जाता है लेकिन पित्रेयपक्ष के दौरान उसका पिंडदान करनेका एक अलग ही प्रकार हिन्दू शास्त्र मे बताया गया है। तो दोस्तो जानते हे की पित्रपाक्स मे गयामे पिंडदान करने से कैसे सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। ओर किस असुर के नाम के ऊपर से इस पवित्र स्थल का नाम गया पड़ा जिसका वर्णन गुरु पुराण मे किया गया है। 

गया का राज क्या है जानिए ? 

गरुड पुराण के आधार काण्ड मे वर्णित की कथा अनुसार जब ब्रम्हाजी सुष्टि की रचना कर रहे थे। तब उस समय पर एक असुर कुलमे गया नाम का एक असुरकी रचना हो गई थी। क्यू की उसने कोई असुर स्त्री की कोख से जन्म नई लिया था इसलियर उसमे असुरो वाली प्रवूति नहीं थी। इसलिए उसने सोचा की कोई बड़ा कोई काम नहीं करेंगा तो उसे अपने कुल मे कोई सन्मान नहीं करेंगा। यही सोसकर असुर भगवान विष्णु की  घोर तपस्या करने लगा। उस समय प्रशायत गायसुर के कठोर तप से लेकर भगवान विष्णु जी गायसुर के सामने प्रस्स्न होकर गयासुर के सामने प्रगट होकर उसे एक वरदान मांगने कहा। गायसुर ने वरदान मांगा की आप मेरे शरीर के अंदर आप वास करे ओर जो मौजे देखे उनके सारे पाप नष्ट हो जाये ओर वो पुण्यात्मक हो जाये ओर उसे स्वर्ग मे स्थान मिले। भगवान उसने ये वरदान दे दिया था। ओर वाहा से भगवान विष्णु चले गए। इसके बाद जो भी गयासुर को जो देखते हे उनके सभी पाप दूर हो जाते है। धीरे धीरे सुशती का विस्तरण वीरखने लगे। ये सब देखकर आकाशमे देव देवताओ सारे चिंतित हो गए। चिनित होकर ये बात भगवान विष्णु को बताई। तब भगवान विष्णु ने सब देवी देवताओ से कहा की की आप एलपीके चिंता ना करे इसका अंत जरूर होंगा। यह भगवान विष्णु की बात सुनकर सब देवी देवता अपने अपने धाम मे चले गए। उसके बाद जब गयासुर एक दिन भगवान शिवकी पूजा के लिए शिव समुद्र से कमल लाकर विष्णु माया से मोहित होकर कीकड़ होकर एक सैन करने लगा। उसी समय भगवान विष्णु की गदा के कारण वह पर गयासुर का वध हो गया यतों मारा गया। परंतु मरने से भगवान विष्णु के सामने एक विनती की थी है नारायण मेरी यही इच्छा हे की आप सभी देवताओ के साथ अप्रतायक के रूप से आप सभी इसी सभी शीला पर आप सभी विराजमान रहे। ओर ये स्थान मुरत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए एक तीर्थस्थल बन जाये।

क्यो करते है गया मे पिंडदान ? 

 भगवान विष्णु ने कहा गया तुम धन्य हो तुम जीवित अवस्थामे भी लोगो का भला होने का वरदान मांगा था ओर मुर्त्यु के बाद भी तुम लोगो की आत्माका कल्याण के लिए तुम वरदान मांग रहे हो। एस बात से लेकार भवन विष्णु फिर एक बार धन्य हो गए। उसके बाद भगवान विष्णु ने गयासुर को आर्शीवाद दिया की जहा पर गया स्थापित हूहा वह पर पितृ के श्राद्ध के लिए ओर दर्पण के लिए वाहा पर मुर्त्यु की पीड़ित आत्माकों जहा पर मुक्ति मिलेंगी। यदि आप गरुड पुराण की आप बात माने तो तभी से वाहा पर पितृ श्राद्ध होने लगा था। जिससे उनको जीवन मरण की उसे मुक्ति मिल सके। ओर वह से आजभी भगवान विष्णु मुक्ति देने के लिए  गदाधार के रुपमे जहा गया मे उपस्थित है। उसके बाद पीतमय बब्रम्हाने गया को श्रेष्ट मानकर वह पर ब्रम्हाजीने वाहा यज्ञ किया था। ओर वृतीक रूप से वहा से आए ब्रामहननो कीपोज़ा वह पे की थी। ब्रम्हाने वह पर रसवती अर्थात जलसे परीपूर्ण एक विशाल नदी, वापी, जलाशय आदि तथा विविध भक्ष्य, भोज्यफल आदि ओर कामधेनु की सुष्टि की थी। तंदतर भगवान ब्रम्हाने इन सब सभी साधू को संपन्न होकर पाँच पोष की परिषेद को परिप्रेक्ष मे फैले उस गया तीर्थ का ज्ञान उन ब्रामहोनों को कर दिया था। ब्रामहोने उस धर्मयज्ञ मे गिए हुहे  दान को लोकवर्षी उसका स्वीकार किया था। तथा उसी काल से पता चल गया की ब्रामहोनों को यह शाप हो गया की तुम्हारे द्रारा उर्चित विध्या ओर धन तीन पुरुष यंत्र अर्थात तीन पेढ़ियो के साथ स्थायी नहीं हो सकता है। तुम्हारे इस गया परिक्षेत्र मे प्रवाहित होने वाली इस रसवती नदी जल एवम पथ्थर की मात्रा मे ही ये नदी प्रवाहित होंगी। 

गरुड पुराण मे ये भी बताया गया की जिनकी संस्कार दशामे किसिभी मुर्त्यु हो जाती है। जब कोई मानुषी कोई हिञ्च्क प्राणी तथा कोई प्राणी के साथ मारा जाता हे, जिनकी मुर्त्यु के सर्प के कारण हो जाती है वे सभी गया शार्द्ध करने वाले वही लोग की श्रद्धा अर्पण यहा पर किया जाता हे तो उसकी मुर्त्यु की आत्मकों स्वर्ग मे शांति पुहंस जाती है। यहा पर पिंड दान करने वाले मित्रो यहा पर उसको मुक्ति मिल जाती है। जो लोग वह गया तलाव मे म्र्त्यु की आत्मकों वाह अजो श्राद्ध ओर मुक्ति पाने केलिए आपको गया पितृ के धाम से आपको आत्मा को शांति मिल जाती। विष्णु पर्वत से लेकर उत्तरमानस प्रवत तक जिसको हम गया स्थिर माना गया है। गया तीर्थस्थल को फल्गुतीर्थ ही माना जाता है। यहा पर पितृदान  करने वालो को यहापरमगति प्राप्ति होती है। गया तीर्थस्थल से ही व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। गया क्षेत्र मे भगवान विष्णु पीटर देवताके रुपमे विराजमान रहते है। यह पितामय ब्रम्हा का दर्शन करके वह पापमुक्त ओर परपिता महादेवाका  दर्शन कराकर अनामय की लोगो की प्राप्ति करता है। उसी प्रकार भगवान गड़ाधार भगवान विष्णु को भी प्रणाम करनेसे उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। इतना भी नहीं जो मनुष्य गया तीर्थ मे आईटी ओर महात्मा के दर्शन करता है तो वह पित्ररून से वो मुक्त हो जाता है। जब आप ब्रांहाकी पूजा करके आप दूसरा जन्म प्राप्त करता है। जो मनुष्य गायत्री देवी का विधिविधान से दर्श कराते हे तो आपको प्रताकालीन संध्या प्राप्त  करता है। ओर उसे सभी वेदो का उसे फल प्राप्त होता है।  जो व्यक्ति मध्यकाल दरमियान सावित्र देवी का दर्शन करता है तो वह मटा सरस्वती दर्शन कराते है। ओर उसे दान का फल प्राप्त होता है।     

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